पापा के साये में चल, मन्जिल को पा लेते हैं

पापा के साये में चल, मन्जिल को पा लेते हैं,
धूप घनी या राह में काँटे, आगे बढ़ते जाते हैं।
लग जाये जो ठोकर पग में, पापा हमें सँभालेंगे,
विश्वासों का सम्बल ले, ध्वज गगन फहराते हैं।

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चिन्तित जब भी चिन्ताओं से, पापा कहते ‘मैं हूँ ना’,
कुरूक्षेत्र में अर्जुन विचलित, कान्हा कहते ‘मै हूँ ना’।
जब जब संकट मानवता पर, हुई धर्म हानि जग में,
तब तब हुये अवतरित भगवन, विष्णु कहते ‘मै हूँ ना”।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन