उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही सपा और भाजपा के महारथियों ने मुकाबले को चढ़ाईं आस्तिनें
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही सपा और भाजपा के महारथियों ने मुकाबले को चढ़ाईं आस्तिनें

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही सपा और भाजपा के महारथियों ने मुकाबले को चढ़ाईं आस्तिनें
✍🏾लेखक- सुरेंद्र सिंघल, राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव एक वर्ष बाद फरवरी 2027 में होने हैं लेकिन इस राज्य में राजनीतिक गतिविधियां इतनी तेज हो गई हैं कि जो पहले कभी नहीं थीं। 2017 से सत्ता में बनी हुई भाजपा के लिए तीसरी बार की जीत अनिवार्य से कम नहीं है जबकि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के लिए यह अपने अस्तित्व को बचाने और लोकसभा चुनाव 2024 में 37 सीटें जीतकर बनाई बढ़त को बरकरार रखने की प्रबल चुनौती है। दोनों प्रमुख दलों ने अपनी गुपचुप रणनीति बनानी शुरू कर दी है और उनके प्रमुख नेताओं की उत्तर प्रदेश में गतिविधियां एकाएक तेज हो चली हैं। 25 जनवरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की सराहना कर जा चुके हैं जबकि उससे एक दिन पूर्व उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस पर केंद्रीय गृह मंत्री उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति के माहिर अमित शाह कह चुके हैं कि भाजपा योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी और जीतने पर वही मुख्यमंत्री होंगे। शाह ने दो-टूक कहा- ऊपर मोदी नीचे योगी। यह बात किसी से ढकी-छिपी नहीं है कि शाह और योगी के बीच लंबे समय से कड़वाहट बनी हुई है और यदि शाह की चले तो योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरी ताकत से योगी आदित्यनाथ के पीछे खड़ा है। उत्तर प्रदेश ही नहीं देशभर में यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि मोदी के बाद योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े लोकप्रिय राजनेता हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में इन दोनों नेताओं की लोकप्रियता उत्तर प्रदेश में काम नहीं आ पाई थी और भाजपा महज 33 सीटों पर सिमट गई थी जबकि उसका राष्ट्रीय लोक दल, अपना दल और दूसरे स्थानीय दलों से मजबूत गठबंधन था। एक सीट अपना दल के नेता अनुप्रिया पटेल, मिर्जापुर जीत पाई थी और दो सीट रालोद डा. राजकुमार सांगवान बागपत और चंदन चौहान बिजनौर जीत पाए थे जबकि सपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 37 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी कांग्रेस के खाते में प्रतिष्ठित अमेठी और रायबरेली समेत छह सीटें गई थी। नगीना सुरक्षित सीट सहारनपुर के उभरते दलित नेता चंद्रशेखर ने जीती थी।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के बाद से अब तक राजनीतिक सियासी माहौल में भाजपा के पक्ष में कोई झुकाव नहीं दिख रहा है। बल्कि कई मायनों में उसके समक्ष चुनौतियां प्रबल हुई हैं जैसे ब्राह्मणों की बड़े स्तर पर नाराजगी, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य परम पूजनीय स्वामी अवि मुक्तेस्वरानंद सरस्वती के साथ योगी आदित्यनाथ की तनातनी और पुलिस दुव्र्यवहार ने स्वर्ण जातियों को बहुत खिन्न किया है। उनमें पूरे प्रकरण को लेकर बेहद तल्खी है और योगी आदित्यनाथ हैं जिनके रूख में इन शंकराचार्यों को लेकर कोई नरमी और दरियादिली नहीं दिख रही है।
सियासत का एक स्थापित सिद्धांत माना जाता है कि इसमें नेताओं की जिद्द और हठ निश्चित रूप से घातक साबित होती है और इस तरह का स्वभाव राजनीति की मूल प्रकृति के विरूद्ध माना जाता है लेकिन योगी आदित्यनाथ का अपना मत और व्यवहार है जो उनके व्यक्तित्व एवं कार्यशैली का अभिन्न अंग बन गया है इसे वे जानें। दूसरा बड़ा मामला जिसने स्वर्ण जातियों को और उनके युवाओं को बेहद अपमानित और पीड़ित किया है वह है यूजीसी के भेदभावपूर्ण नियमों का बनाया जाना। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर बेहद संवेदनशीलता और समझदारी दिखाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है लेकिन भाजपा नेतृत्व ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे हैं। इससे भी भाजपा को उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। बेहद दिलचस्प है कि भाजपा की इन बड़ी विफलताओं को भुनाने के लिए बड़ी तत्परता के साथ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में शामिल अखिलेश यादव आगे आए हैं और उन्होंने ब्राह्मणों और दूसरी स्वर्ण जातियों पर डोरे डालना शुरू कर दिया है। उनके करीबी और सपा के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी का इन पंक्तियों के लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंघल से कहना था कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का उत्पीड़न हो रहा है, व्यापारी असुरक्षित और पीड़ित है, शिक्षकों को पूरा वेतन नहीं दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से भाजपा की बिदाई अखिलेश यादव का आगमन तय है। प्रदेश में पुलिस राज कायम है। विकास चौपट है। यह बुलडोजर सरकार है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुलिस तंत्र का मनमाने ढंग से उपयोग कर रहे हैं। राजेंद्र चौधरी ने वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंघल से खास बात यह कही कि उनकी पार्टी का मुख्य आधार और नारा पीडीए है यानि पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक है लेकिन उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य बिरादरी को भरपूर टिकट देकर मैदान में उतारेगी। उनका कहना था कि भले ही यह माना जाता है कि भाजपा बनियों की पार्टी है लेकिन अखिलश यादव बनियों को बीजेपी से कहीं ज्यादा शहरी सीटों पर उम्मीदवार बनाकर बीजेपी के समक्ष कड़ी चुनौती पेश करने वाले हैं।
राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन होगा और दूसरे दलों के लिए भी उनके द्वार खुले हुए हैं। राजेंद्र चौधरी उत्तर प्रदेश के ऐसे नेताओं में शामिल हैं जो यहां की सियासत से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। उनका दावा है कि भाजपा 100 से नीचे और सपा 300 के पास जाएगी। वह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज में कहीं भी यह परिलक्षित नहीं होता है कि यह डबल इंजन सरकार है। यह केवल योगी सरकार है और हमारी तैयारियां भाजपा को परास्त करने को लेकर पूरी है। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा गठबंधन 217 से ज्यादा सीटों पर आगे रहा था जबकि भाजपा गठबंधन 174 विधानसभा सीटों पर आगे रहा था। दोनों गठबंधनों के बीच 33 सीटों का बड़ा अंतर रहा था। उत्तर प्रदेश में विपक्ष को तगड़ी चुनौती देने के लिए निर्दलीय दलित सांसद चंद्रशेखर और ओवेसी की पार्टी एवं गर्त की ओर जा रही मायावती की बीएसपी तगड़ी चुनौती पेश करेंगे। इसमें भाजपा अपनी उम्मीदें तलाश रही है। मुस्लिम सोच के जानकारों के अनुसार मुस्लिम मत एकमुश्त होकर भाजपा को हराने वाले दल के उम्मीदवार के पक्ष में लामबंद होकर मतदान करेंगे। वे बंटेंगे नहीं। दलित वोटों के बीच मुख्य बंटवारा सपा-कांग्रेस गठबंधन और मायावती एवं चंद्रशेखर के बीच होगा। बीजेपी को दलित वोटों में सेंधमारी करने के लिए बेहद कड़ी मशक्कत करनी होगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति चमारों का प्रतिनिधित्व रालोद के पुरकाजी विधायक अनिल कुमार जो योगी सरकार में काबिना मंत्री भी हैं, करते हैं। लेकिन भाजपा सरकार उनका दूर दूर तक लाभ उठाती हुई नहीं दिखती है। अनिल कुमार अपने छोटे दायरे में सिमटे हुए हैं। भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष का पद भी दलित वर्ग को नहीं सौंपा है। सभी बड़े पदों पर गैर दलित आसीन हैं। भाजपा ने भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया है। भले ही उसके गठबंधन में जयंत चौधरी शामिल हैं। लेकिन सपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज्यादातर सीटों पर जाटों को उतारने की रणनीति बनाई है। ऐसे में वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ प्रांत में गैर जाट को अध्यक्ष बनाने का जोखिम नहीं ले सकती है।
जानकारों के मुताबिक अपना निजी प्रभाव और महत्व बनाने के लिए चौधरी भूपेंद्र सिंह, संजीव कुमार बालियान और मोहित बेनीवाल जैसे जाट नेता नहीं चाहते कि कोई ऊर्जावान और क्षमताओं से भरपूर किसी नए जाट चेहरे को पश्चिम की कमान सौंपी जाए। नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के करीबी सूत्रों के मुताबिक वह पश्चिम प्रांत का अध्यक्ष जाट बिरादरी को ही बनाने के पक्षधर हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान बिरादरियों में रालोद भले ही कमजोर हो लेकिन किसानों में चौधरी चरण सिंह के प्रति अभी भी बेहद सम्मान बना हुआ है। भाजपा केंद्र और उत्तर प्रदेश की किसान समर्थक नीतियो और उपलब्धियों को तभी भुनाने में सफल हो सकती है जब वह मेरठ प्रांत का अध्यक्ष पद जाट बिरादरी को सौंपे। पड़ौसी राज्यों दिल्ली और हरियाणा में जाटों की उपेक्षा से पहले ही पश्चिम का जाट भाजपा से खपा है और लोकसभा चुनावों में उसने अपनी नाराजगी जाट बहुल क्षेत्रों में भाजपा को दिखाकर कर दी थी।
जाहिर है उत्तर प्रदेश में जातियों के बीच जो उथल पुथल और नाराजगी की लपटें दिख रही हैं वह स्थिति भाजपा के अनुकूल तो नहीं लगती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थान स्थान पर छोटे मोटे हिंदू सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है, जिनकी उपस्थिति कोई उम्मीद नहीं जगाती। ये सम्मेलन उनके अपने लोगों तक ही सीमित है। जाहिर है यूपी के ताजे राजनीतिक हालात विपक्ष के लिए उत्साहजनक है और भाजपा को इस पर पार पाने के लिए बहुत कुछ करना होगा। लेकि
न अभी तक उसकी ऐसी कोई पहल सामने नहीं आती है जिससे उसके तीसरी बार चुनाव जीतने की पुख्ता उम्मीदें बांधी जाए।

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