गोदावरी नदी ‘दक्षिण गंगा’ या ‘वृद्ध गंगा’

गोदावरी नदी को 'दक्षिण गंगा' या 'वृद्ध गंगा'

गोदावरी नदी को ‘दक्षिण गंगा’ या ‘वृद्ध गंगा’ कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति की कहानी महर्षि गौतम और उनके द्वारा किए गए एक अनजाने पाप के प्रायश्चित से जुड़ी है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और पश्चाताप से स्वयं महादेव को भी प्रसन्न किया जा सकता है।

प्राचीन काल में दक्षिण भारत में 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, जिससे भयानक अकाल पड़ा। महर्षि गौतम ने अपनी तपस्या के बल पर एक ऐसा दिव्य खेत तैयार किया जहाँ कभी अनाज खत्म नहीं होता था। वे वहां आने वाले सभी ऋषि-मुनियों और भूखों को भोजन कराते थे।

गौतम ऋषि की कीर्ति देखकर कुछ अन्य ऋषियों को ईर्ष्या होने लगी। उन्होंने उन्हें नीचा दिखाने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने अपनी शक्तियों से एक ‘मायावी गाय’ बनाई और उसे गौतम ऋषि के खेत में भेज दिया। जब गौतम ऋषि ने उस गाय को खेत से भगाने के लिए हाथ में एक तिनका लेकर उसे स्पर्श किया, तो वह मायावी गाय वहीं गिरकर मर गई।

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ऋषियों ने उन पर ‘गौ-हत्या’ का आरोप लगाया और उन्हें आश्रम से निकाल दिया। दुखी होकर गौतम ऋषि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। जब महादेव प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा, तो ऋषि ने प्रार्थना की:
“हे प्रभु! मुझे इस गौ-हत्या के पाप से मुक्त करें और गंगा की एक धारा यहाँ भेज दें ताकि मैं उसमें स्नान कर पवित्र हो सकूँ।”

भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को मुक्त किया। लेकिन गंगा (नदी) ने शर्त रखी कि वे तभी वहां रुकेंगी जब महादेव भी वहां निवास करेंगे। शिव जी ‘त्र्यंबकेश्वर’ ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां स्थित हो गए और गंगा ‘गोदावरी’ के रूप में प्रकट हुईं।
* नाम का अर्थ: क्योंकि इस नदी का जन्म एक गौ (गाय) को जीवन दान देने और उसे शुद्ध करने के लिए हुआ था, इसलिए इनका नाम ‘गोदावरी’ पड़ा।

माना जाता है कि गोदावरी में स्नान करने से व्यक्ति के वे पाप भी धुल जाते हैं जो उसने अनजाने में किए हों, बिल्कुल वैसे ही जैसे महर्षि गौतम का अनजाना पाप धुल गया था।