विवाह-संस्कार का चतुर्थ अंग सप्तपदी है। सप्तपदी का अर्थ है-सात

विवाह-संस्कार का चतुर्थ अंग सप्तपदी है। सप्तपदी का अर्थ है-सात

सप्तपदी

विवाह-संस्कार का चतुर्थ अंग सप्तपदी है। सप्तपदी का अर्थ है-सात

कदम तक चलना। अग्नि के उत्तर में एक पटड़े पर चावल के सात ढेर या

लाइन बनाकर रख दिया जाता है। वर दाये हाथ से वधू का हाथ पकड़े एवं

वधू हर मन्त्र के उच्चारण के साथ अपने दायें पैर से एक-एक ढेर (लाइन)

को मिटाती है। इसमें एक-एक करके आचार्य मन्त्र बोलते हैं।

‘एकमिषे विष्णुस्त्वानयतु’

अर्थात् हे सुभगे! विष्णु भगवान् तुझे अन्न (की रक्षादि) के लिए

(गृहस्थ के) प्रथम स्थान को प्राप्त करायें। दूसरे में बल, तीसरे में धन, चौथे

में भाव्यता, पांचवें में सन्तति, छठे में इष्ट भोग ।

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इस प्रकार गृहधर्म के छहों स्थानों की अधिकारिणी हो जाने पर स्त्री

पुरुष की पूर्णरूपेण अर्धांगिनी बन जाती है। जो लोग हिन्दू धर्म में स्त्री की

स्थिति के बारे में तरह-तरह के आक्षेप करते हैं और समझते हैं कि हिन्दू धर्म

में स्त्री का पद दासी का-सा है, उन्हें वेद के इस सातवें मन्त्र को आंख

खोलकर पढ़ना और समझना चाहिए। सातवें पदाक्रमण के लिए प्रेरित करता

हुआ वर कहता है- हे सखे! अब तुम सखित्व की प्राप्ति के लिए सातवां पद

आगे बढ़ाओ, तुम सर्वदा मेरे अनुकूल रहो। विष्णु तुम्हें इस मित्र रूप सातवें

स्थान को प्राप्त करायें। सातवां कदम बढ़ाते हुए स्त्री पुरुष की सहधर्मिणी,

सहचारिणी एवं अभिन्न आत्मा बन जाती है।🙏🪷