देवराज इंद्र की दिव्य शक्ति स्वरूपा देवी इंद्राणी (ऐन्द्री) मातृका शक्तियों में अत्यंत तेजस्विनी और पराक्रमी देवी मानी जाती हैं।

देवराज इंद्र की दिव्य शक्ति स्वरूपा देवी इंद्राणी (ऐन्द्री) मातृका शक्तियों में अत्यंत तेजस्विनी और पराक्रमी देवी मानी जाती हैं।

॥ ऐन्द्री गजसमारूढा ॥

देवराज इंद्र की दिव्य शक्ति स्वरूपा देवी इंद्राणी (ऐन्द्री) मातृका शक्तियों में अत्यंत तेजस्विनी और पराक्रमी देवी मानी जाती हैं। सप्तमातृका एवं अष्टमातृका समूह में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। देवी ऐन्द्री गजराज पर आरूढ़ होकर समस्त दैत्यों और अधर्म का विनाश करती हैं तथा साधकों को ऐश्वर्य, सौन्दर्य और अपार सामर्थ्य प्रदान करती हैं।

ब्रह्माण्डपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, स्कन्दपुराण, लिंगपुराण तथा अनेक तंत्रागम ग्रंथों में मातृकाओं के साथ देवी ऐन्द्री का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में देवी को देवराज इंद्र की शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो युद्धभूमि में देवताओं की विजय का कारण बनती हैं और शत्रुओं का संहार करती हैं।
महाविद्या स्वरूप में देवी ऐन्द्री को नटी, रक्तवर्णा और क्रोधमयी शक्ति कहा गया है। वे सदैव दिव्य कवच धारण करती हैं और हाथों में वज्र, अंकुश अथवा कमल धारण कर गजराज पर विराजमान रहती हैं। उनका तेज सूर्य के समान प्रखर तथा उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और उग्र माना गया है।

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उड़ीसा (उत्कल) के प्राचीन मंदिरों में देवी इंद्राणी को द्विभुजा और चतुर्भुजा रूपों में दर्शाया जाता है। विशेषतः पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर परिसर में देवी इंद्राणी का स्वतंत्र मंदिर भी विद्यमान है, जहाँ भक्त उनकी आराधना कर विजय, वैभव और पराक्रम की प्राप्ति की कामना करते हैं।

नवरात्र के दूसरे दिवस पर देवी ऐन्द्री की आराधना से साधक को साहस, पराक्रम और दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है। यह देवी साधक के जीवन से भय, दुर्बलता और विघ्नों का नाश कर विजय का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

श्लोक
गजस्थिता महाशक्तिरिन्द्राणी देवपूजिता।
वज्रहस्ता वरदायिनी शत्रुसंहारकारिणी॥
ऐश्वर्यं बलमोजश्च ददाति भक्तवत्सला।
जयन्ती सर्वदुष्टानां ऐन्द्री देवी नमोऽस्तु ते॥

देवी ऐन्द्री की कृपा से सभी साधकों को अदम्य साहस, तेज और विजय प्राप्त हो।