श्रीमद भगवद गीता से
श्रीमद भगवद गीता से

श्रीमद भगवद गीता से –
(द्वारा सकारात्मक चिन्तन ग्रुप)
मनुष्य शरीर में भगवान की प्राप्ति का मौका था, मनुष्य भगवत प्राप्ति के पास आ गया था, पर श्रद्धा न होने के कारण वह भगवान की प्राप्ति न करके संसार में ही घूमता रहता है।
जो नित्य विद्यमान है, उसको न मानकर वह जो एक क्षण भी नहीं टिकता, उसका अन्त:करण इतना अशुद्ध होता है कि भगवान का प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर भी श्रद्धा नहीं करता।
जैसे- सत्संग, कीर्तन आदि में प्रत्यक्ष लाभ दिखने पर भी वह उसमें विशेषता से नहीं लगता। किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु होने पर या अन्य कोई घटना घटने पर उसको संसार से वैराग्य होता है, फिर भी वह उसमें स्थिर नहीं रहता l
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एक विभाग भोग का है और एक विभाग योग का है। राग-द्वेष से युक्त ‘भोगी’ मनुष्य अगर विषयों का चिन्तन भी करे तो उसका पतन हो जाता है, परन्तु राग-द्वेष से रहित ‘योगी’ मनुष्य अगर विषयों का सेवन भी करे तो उसका पतन नहीं होता, प्रत्युत वह परमात्मतत्त्व को प्राप्त हो जाता है।
राग-द्वेष से रहित मनुष्य भोगबुद्धि से विषयों का सेवन नहीं करता अर्थात् भोगजन्य सुख (रस) नहीं लेता, क्योंकि यह उसका ध्येय नहीं है । वह भोगों को रागपूर्वक न भोगकर त्यागपूर्वक भोगता है, इसलिये उसका अन्त:करण निर्मल हो जाता है। त्यागपूर्वक भोग वास्तव में भोग है ही नहीं। लोगों की दृष्टि में उसके द्वारा भोग का आचरण दिखता है, होता नहीं l राग-द्वेष से रहित होने पर ‘प्रसाद’ की प्राप्ति होती है। हरदम प्रसन्नता रहे, कभी खिन्नता न आये, नीरसता न आये—यह ‘प्रसाद’ है ।

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