बेटी…बोझ नहीं।
बेटी...बोझ नहीं।

बेटी…बोझ नहीं।
कमल मित्तल
( वरिष्ठ पत्रकार)
घर – परिवार में जब एक कन्या का जन्म होता है तो भविष्य के एक नए परिवार की शुरुआत भी होती है। जब कन्या जन्म लेती है तब वह अपनी मां की बेटी होती है, पिता की पुत्री होती है,बाबा- दादी की पोती होती है, बुआ की भतीजी होती है और भाई की बहन होती। समय के अनुसार उसके बड़े होने के साथ उसके रिश्तों में बदलाव की शुरुआत हो जाती है। जब उसकी शादी होती है तो वह अपने ससुराल जाती है, वहां वह पति की पत्नी सास की बहू बनती है और फिर जब वह एक बेटी को जन्म देती है तो फिर वही पारिवारिक रिश्ते जन्म लेते हैं। ऐसे में केंद्रीय भूमिका में बेटी ही हुई ना। तो फिर हम भी बेटी को कम महत्व कैसे दे सकते हैं। वर्तमान परिवेश में बेटा बेटी के बीच कोई अंतर नहीं समझा जाता और बेटी को भी लालन- पालन, पढ़ाई- लिखाई में वह सब सुविधा है उपलब्ध रहती है जो परिवार में एक बेटे को होती है ऐसे में बेटा बेटी के बीच किसी ऊच नीच की भावना को कहना समझ से परे है।
जब परिवार में बेटी का स्थान इतना केंद्रीय करत है तो बेटियां मां-बाप परिवार पर बोझ के रूप में क्यों समझी जाती है। इसका कारण कहीं ना कहीं पारिवारिक संवाद की कमी और चकाचौंध भरे इस सामाजिक परिवेश में सोशल मीडिया का बढ़ता कुप्रभाव इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है। लेकिन सभी मां-बाप या बेटी के परिजन अपनी बेटी से यही अपेक्षा करते हैं कि वह घर परिवार के सम्मान इज्जत को बनाए रखेगी और अपने मां-बाप सास- ससुर, पति की इज्जत और गरिमा का ध्यान रखेंगी।

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